जयपुर , अप्रैल 03 -- राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि बेटे और दामाद के रिश्ते में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए, खासकर ऐसे मामलों में जहां परिवारिक जिम्मेदारियों की बात हों।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी बेटे को माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जमानत दी जा सकती है, तो उसी आधार पर दामाद को भी यह अधिकार मिलना चाहिए।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंढ की एकलपीठ ने कहा कि भारतीय समाज में दामाद भी परिवार का अहम हिस्सा होता है और कई मामलों में वह बेटे की तरह ही जिम्मेदारियां निभाता है। ऐसे में केवल रिश्ते के आधार पर अलग-अलग मानदंड अपनाना उचित नहीं है।
यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी सास के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए जमानत की मांग की थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह परिवार का सदस्य होने के नाते अंतिम संस्कार में शामिल होना चाहता है।
न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि मानवीय आधार पर ऐसे मामलों में संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि रिश्तों के आधार पर भेदभाव करना।
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