अमृतसर , मार्च 10 -- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में 'अनामिका आर्ट्स एसोसिएशन अमृतसर' द्वारा मंगलवार को 'स्वरूप रानी सरकारी महिला कॉलेज अमृतसर' के सहयोग से महिला के संघर्ष की कहानी बयां करने वाले नाटक "फॉरएवर महारानी जिंदां" का मंचन किया गया।
डॉ. आत्मा सिंह गिल द्वारा लिखित और इमैनुएल सिंह द्वारा निर्देशित इस नाटक के माध्यम से आज की नई पीढ़ी को पंजाब के उस सुनहरे दौर से परिचित कराने का सफल प्रयास किया गया, जिसे खालसा राज या शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के नाम से जाना जाता है।
स्वरूप रानी सरकारी महिला कॉलेज की प्रिंसिपल किरणजीत बल ने बताया कि नाटक में सिख साम्राज्य के पतन के साथ-साथ महारानी जिंदां और महाराजा दलीप सिंह की त्रासदी को विभिन्न नाटकीय युक्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। मंच पर महारानी जिंदां के जीवन संघर्ष, खोए हुए सिख साम्राज्य की पुनः प्राप्ति के लिए उनकी जद्दोजहद और बालक महाराजा दलीप सिंह को उनके अधिकार दिलाने के प्रयासों को बखूबी दर्शाया गया।
महारानी जिंदां वह महान महिला थीं, जिन्होंने अंग्रेजों से बागी होकर पूरी उम्र एक शेरनी की तरह सिख साम्राज्य के लिए लड़ाई लड़ी। अंततः अपने प्रभाव से उन्होंने ईसाई बन चुके दलीप सिंह के भीतर पुनः महाराजा बनने की चिंगारी पैदा की।
शाह मोहम्मद की कविता 'जंगनामा सिंघा ते फिरंगियां' को आधार बनाकर और स्वयं लेखक शाह मोहम्मद को ही 'सूत्रधार' के रूप में पेश करते हुए, इस नाटक को किस्सागोई, लोक वार-कवीशरी की विधा के माध्यम से लोकधारा के अंदाज में प्रस्तुत किया गया।
प्रिंसिपल किरणजीत बल ने कहा कि ऐतिहासिक नाटक का मंचन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, जिसे इमैनुएल सिंह और उनकी टीम ने बेहतरीन तरीके से निभाया है। उल्लेखनीय है कि नाटक में ऐतिहासिक तारीखों, घटनाओं और महारानी जिंदां की मूल पत्रों (चिट्ठियों) को शामिल किया गया था। साथ ही, खालसा राज के तख्त की हू-ब-हू नकल के जरिए उस समय के गौरवमयी इतिहास को जीवंत किया गया।
उल्लेखनीय है कि महारानी जिन्द कौर (जिंदां), महाराजा रणजीत सिंह की सबसे छोटी पत्नी और सिखों के अंतिम महाराजा दलीप सिंह की माँ थीं। महाराजा रणजीत सिंह के निधन के बाद, जब सिख साम्राज्य आंतरिक साजिशों और ब्रिटिश हस्तक्षेप के कारण बिखर रहा था, तब महारानी जिंदां ने अपने छोटे बेटे के लिए 'रीजेंट' (संरक्षक) के रूप में शासन संभाला। महारानी जिंदां अपनी निडरता और कूटनीतिक बुद्धि के लिए जानी जाती थीं। ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी उन्हें पंजाब में ब्रिटिश शासन के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता था। वह इतनी प्रभावशाली थीं कि अंग्रेजों ने उन्हें 'पंजाब की मेसलिना' तक कह डाला था और उन्हें उनके बेटे से अलग कर चुनार के किले में कैद कर दिया था।
महारानी जिंदां की वीरता का प्रमाण तब मिला जब वे एक नौकरानी का भेष बनाकर चुनार के किले (उत्तर प्रदेश) से भाग निकलीं और 800 मील की कठिन यात्रा तय कर नेपाल पहुँचीं। वहाँ के राजा ने उन्हें शरण दी, जहाँ से उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ पंजाब में विद्रोह भड़काने के लिए गुप्त पत्र लिखेइस नाटक में जिन 'चिट्ठियों' का जिक्र किया गया है, वे ऐतिहासिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पत्र महारानी द्वारा अपने बेटे दलीप सिंह और सिख जनरलों को लिखे गए थे, जिनमें उनके दर्द, देशप्रेम और सिख राज को वापस पाने की तड़प झलकती है।
नाटक का सबसे भावुक हिस्सा वह है जब कई वर्षों के अलगाव के बाद महारानी जिंदां अपने बेटे दलीप सिंह से कलकत्ता (अब कोलकाता) में मिलती हैं। उस समय तक दलीप सिंह ईसाई बन चुके थे और इंग्लैंड में रह रहे थे। यह महारानी जिंदां की ही प्रेरणा थी कि दलीप सिंह ने पुनः अपनी जड़ों (सिख धर्म) की ओर लौटने और अपनी विरासत के लिए लड़ने का निर्णय लिया।
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