नयी दिल्ली , फरवरी 05 -- केंद्र सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को 'ब्लू इकोनॉमी' (नीली अर्थव्यवस्था) के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने के लिए समुद्री मछली पालन के साथ-साथ समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती को तेजी से बढ़ावा दे रही है।

पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 'केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान' ने अंडमान के तट पर वाणिज्यिक समुद्री शैवाल की पायलट-स्तरीय खेती शुरू करने के लिए व्यवहारिका संबंधी अध्ययन पूरा कर लिया है।

श्री सिंह ने बताया कि समुद्री शैवाल की खेती के लिए सबसे उपयुक्त स्थानों की पहचान करने के लिए 25 अलग-अलग स्थानों का व्यापक विश्लेषण कियागया है। इसके अलावा, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संस्थान 'राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान' ने अंडमान सागर में पहली बार गहरे पानीमें समुद्री शैवाल की खेती और ओपन-सी समुद्री मछली पालन परियोजना शुरू की है। सीएसआईआर ने 'सीवीड मिशन' भी शुरू किया है ताकि इस खेती को पर्यावरण के अनुकूल, टिकाऊ और लाभदायक बनाया जा सके।

उन्होंने कहा कि सरकार की इन कोशिशों से एक नये समुद्री शैवाल उद्योग का विकास हुआ है, जिससे रोजगार और राजस्व के नए अवसर पैदा हुए हैं। अब तक समुद्री शैवाल से जुड़ी प्रौद्योगिकियां 12 कंपनियों को व्यावसायिक उपयोग के लिए हस्तांतरित की जा चुकी हैं। तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में लगभग 5,000 मछुआरों को इस संबंध में प्रशिक्षित किया जा चुका है। सरकार विशेष रूप से महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इस खेती को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय और संस्थागत उपाय कर रही है।

केंद्र सरकार ने 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' के तहत सरकार ने 2030 तक समुद्री शैवाल उत्पादन को 11.2 लाख टन तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। इस क्षमता विस्तार के लिए तटीय क्षेत्रों में 46,095 सीवीड राफ्ट और 65,330 मोनोलाइन ट्यूब नेट की मंजूरी दी गयी है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान के मंडपम केंद्र को समुद्री शैवाल की खेती के लिए 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' और 'न्यूक्लियस ब्रीडिंग सेंटर' के रूप में नामित किया गया है। इस पहल से 20,000 से अधिक किसानों को लाभ होने और 5,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।

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