वाराणसी, नवम्बर 1 -- Varanasi News: सारनाथ (वाराणसी), संवाददाता। प्रत्येक सतत्व का चित्त अपने मूलस्वरूप में शुद्ध एवं प्रभास्वर हैं। अज्ञान एवं अन्य मानसिक क्लेश चित्त का स्वाभाविक गुण नहीं बल्कि आगंतुक आवरण हैं। प्रज्ञा एवं करुणा के समन्वित विकास से इन्हें दूर किया जा सकता है। ये विचार निर्वासित तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री एवं केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के पूर्व कुलपति प्रो. एस. रिनपोछे ने व्यक्त किए। प्रो.रिनपोछे रविवार को केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान में उत्तरतंत्र में प्रतिपादित बुद्ध स्वभाव की अवधारणा पर विचार व्यक्त कर रहे थे। अध्यक्षता करते हुए संस्थान के कुलपति प्रो. वांगचुक दोर्जे नेगी ने कहा कि बौद्ध दर्शन में प्रज्ञा एवं करुणा का समन्वय अत्यंत महत्वपूर्ण है। चित्त, ज्ञान-करुणा एवं सामर्थ्य का आधार है। स...