सुल्तानपुर, अगस्त 3 -- Sultanpur News: करौंदीकला, संवाददाता "झूला डलवइ दा सजनवा सावन आयो रे, कजरी गावत भींज गई अँचरा मोरा.. रिमझिम बरसे बदरिया, पिया मिलन की आस जगायो रे.."

सावन का माहौल सावन का महीना केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के मधुर मिलन का प्रतीक रहा है। जब काले बादल आसमान में छा जाते हैं, हल्की फुहारें धरती को भिगोती हैं और हरियाली चारों ओर मुस्कान बिखेरती है, पहले तब गांवों में जीवन जैसे गुनगुनाने लगता था। इसी प्राकृतिक सौंदर्य के बीच जन्म लेती थी कजरी- विरह, प्रेम और मिलन की भावनाओं से सराबोर वह लोकधुन, जो हर दिल को छू जाती थी।

परंपरा का महत्व एक समय था जब सावन आते ही गांवों का स्वरूप बदल जाता था। आम, नीम और पीपल के पेड़ों पर झूले पड़ते थे, आंगन हरे-भरे हो जाते थे और बहन-बेटियां मायके लौटकर इस ऋतु के उल्लास क...