नई दिल्ली, जून 17 -- यदा संहरते चायं कूर्मोडड्रानीव सर्वः।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थ भ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥कछुए से क्या सीखना चाहिए गीता के इस श्लोक में कछुए का उदाहरण दिया गया है। इसका मतलब है कि कैसे आप कछुए से भी काफी कुछ सीख सकते हैं। गीता का यह श्लोक आपको एक छोटे से जीव से सीख लेने को कह रहा है। इसका अर्थ है कि कछुआ कैसे चलता है, हमें उसके चलने से कुछ सीखना चाहिए। दरअसल कछुआ जब चलता है तो उसके सभी अंग जैसे चार पैर, एक पूंछ और उसका माथा दिखाई देता है, लेकिन जब वो बैठता है, तो पता भी नहीं चलता कि वो कछुआ बैठा है या कोई पत्थर, क्योंकि उसका बैठना बहुत खास होता है। कछुआ जब बैठता है तो ना तो उसके पैर दिखाई देते हैं और ना ही उसकी पुंछ और उसका माथा। वो सभी अंदर को छिपा कर बैठता है। इसलिए हमारा मन भी कछुए की तरह होना चाहिए। पांच हमारी इं...