नई दिल्ली, जुलाई 8 -- जब भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है, तो अमूमन 1920 के बाद के दौर या फिर भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे जांबाज नायकों का जिक्र सबसे पहले आता है। लेकिन सन 1920 से भी बहुत पहले, 19वीं सदी के आखिरी दशक में, महाराष्ट्र की धरती पर एक ऐसी चिंगारी सुलग रही थी जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाकर रख दी थी। ये कहानी है उस दौर की जब एक महामारी के बीच दमनकारी नीतियों ने आम जनता का जीना दूभर कर दिया था और तब तीन भाइयों ने मिलकर देश के पहले सशस्त्र युवा विद्रोह की पटकथा लिखी थी।क्या हुआ था? पुणे का वो दौर बेहद खौफनाक था। एक तरफ ब्युबोनिक प्लेग का कहर था और दूसरी तरफ ब्रिटिश प्लेग कमिश्नर डब्ल्यू. सी. रैंड का अत्याचार। स्वच्छता के नाम पर अंग्रेज सैनिक घरों में घुसकर बदसलूकी करते, संपत्ति को नुकसान पहुंचाते और लोगों की धार...