नई दिल्ली, जुलाई 30 -- कहते हैं कि हौसला अगर सच्चा हो तो अंधेरा भी रास्ता नहीं रोक पाता। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट इलाके की रहने वाली बिमला मांझी ने यही साबित करके दिखाया है। जिस गांव में शाम ढलते ही बिजली गुल हो जाया करती थी, वहां एक बेटी टॉर्च की मद्धिम रोशनी में किताबें खोलकर बैठ जाती थी। न सुविधाएं थीं, न संसाधन, लेकिन इरादा इतना पक्का था कि उसने नीट जैसी मुश्किल परीक्षा को पहले ही प्रयास में पार कर लिया। अब बिमला मांझी मैनपाट के उस बेहद पिछड़े समाज से आने वाली पहली बेटी बन गई हैं, जो डॉक्टर बनने की राह पर चल पड़ी हैं। उनकी यह कहानी सिर्फ एक सफलता की गाथा नहीं, बल्कि उन हजारों बच्चों के लिए मिसाल है जो हालात को अपनी मंजिल के आड़े नहीं आने देते।अंधेरे में भी नहीं बुझी पढ़ाई की लौ नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिमला बताती ह...