मुंगेर, अगस्त 13 -- Munger News: मुंगेर,हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। संन्यास पीठ में चातुर्मास अनुष्ठान के तहत चल रहे भागवत कथा के तीसरे दिन परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, त्याग और निष्काम सेवा को आध्यात्मिक साधना का आधार बताया। सेवा केवल किसी दूसरे की सहायता करना नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से बदलने की साधना है। निष्काम भाव से किया गया कर्म मन की संकीर्णता और नकारात्मकता को कम करता है तथा विनम्रता और कृतज्ञता का भाव विकसित करता है। उन्होंने आत्मशुद्धि को सतत प्रक्रिया बताते हुए कहा कि यह एक दिन में पूरी नहीं होती। इसके लिए हर दिन एक छोटा संकल्प लेना और उसे पूरी निष्ठा से पूरा करना चाहिए। निरंतर अभ्यास ही विचार, व्यवहार और जीवन में परिवर्तन लाता है। निष्काम सेवा में कर्म तो होता है, लेकिन कर्म का अहंकार नहीं; सहायता होती...