ललितपुर, सितम्बर 24 -- Lalitpur News: ललितपुर। जीवन की यात्रा अकेले अकेले चुपचाप नदी की तरह करनी होगी, जैसे नदी बिना किसी की प्रतीक्षा किए बिना किसी से बातचीत किए समर्पित भाव में एक लक्ष्य बनाकर चलती है। जैन अटा मन्दिर में पर्युषण पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री विशद सागर महाराज ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि आकिंचन्य धर्म आत्मा की उस दशा का नाम है, जहां बाहरी सब छूट जाता है। लेकिन, आंतरिक संकल्प विकल्पों की परिणिति को भी विश्राम मिल जाता है। बाहरी परित्याग के बाद भी मन में मैं और मेरे पन का भाव निरंतर चलता रहता है, जिससे आत्मा बोझिल होती है और मुक्ति की यात्रा नहीं कर पाती है। यह भी पढ़ें- पर्युषण पर्व : मोक्ष मार्ग की सीढ़ी है आकिंचन धर्म आज का धर्म जीवन की यात्रा को एकांकी आगे बढ़ाने का धर्म है। एकत्व में शान्ति और अनेकत्व में ...