नई दिल्ली, अगस्त 25 -- संतोष आर्यन, पिथौरागढ़ HilJatra: हुड़के की गूंज, ढोल-दमाऊ की थाप और माटी की अटूट आस्था के बीच पिथौरागढ़ में कुमौड़ का ऐतिहासिक मैदान सोरघाटी की जीवंत लोकसंस्कृति का साक्षी बना। न कोई मंच था, न कोई पर्दा...बस माटी की सोंधी महक और लकड़ी के मुखौटों के पीछे धड़कता सोर का दिल। मैदान में जब गल्या बैल, हुक्का पीते किसान उतरे, तो लगा मानो कृषि संस्कृति खुद मुस्कुरा उठी हो और जैसे ही शिव के गण लखिया भूत का मैदान में अवतरण हुआ, पूरा कुमौड़ जयकारों से गूंज उठा। लखिया भूत का भव्य स्वरूप और पारंपरिक पात्रों ने नेपाल नरेश के दरबार से लेकर चार महर भाइयों के शौर्य की उस अनूठी गाथा को जीवंत कर दिया, जिसकी गवाह वर्षो से यह सीमांत माटी बनती आई है। कुमौड़ की प्रसिद्ध हिलजात्रा में लखिया भूत की एक झलक पाने को लोग बेताब नजर आए। लखिया भूत...