गिरडीह, अक्टूबर 28 -- Gridih News: पीरटांड़, प्रतिनिधि। जीवन को सार्थक, संस्कारित और अनुशासित बनाने के लिए धर्म, मर्यादा, संयम और सदाचार का पालन जरूरी है। हालांकि, इनका उद्देश्य केवल नियमों के बंधन में बंधे रहना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर सहजता, सरलता, शांति और सद्भावना का विकास करना है। व्रत, नियम और संयम जीवन को बेहतर बनाने के साधन हैं, साध्य नहीं। जीवन की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब इनसे व्यक्ति के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव आए और उसके भीतर सद्गुणों का विकास हो। उक्त बातें राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन, मधुबन में आयोजित शंका समाधान कार्यक्रम में युवाओं और अभिभावकों को मार्गदर्शन देते हुए कहीं। गुणायतन में साधनारत मुनिश्री ने कहा कि समय के साथ बदलाव आना स्वाभाविक है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर ऐसा भटकाव स्वीकार नहीं...