नई दिल्ली, मई 5 -- सत्राजित ने सूर्यदेव की उपासना करके उन्हें प्रसन्न किया। फलस्वरूप सूर्य ने उन्हें स्यमंतक मणि प्रदान की। वह सूर्य के समान तेजोमयी थी। इस मणि को धारण करने वाले व्यक्ति का प्रभाव सूर्य के समान हो जाता था। एक बार सत्राजित स्यमंतक मणि को गले में पहनकर, कृष्ण की राजसभा में गया। स्यमंतक मणि के कारण सत्राजित दूसरे सूर्य की भांति ज्ञात हो रहा था। सभी आश्चर्य से उसे आंखें फाड़ कर देख रहे थे। राजसभा के सभी सदस्य उठकर खड़े हो गए और एक स्वर में कह उठे, 'यह दूसरा सूर्य कहां से आ गया?'कृष्ण ने राजसभा के सदस्यों को बताया, यह दूसरा सूर्य नहीं, सत्राजित है। स्यमंतक मणि पहनने के कारण यह दूसरे सूर्य की तरह प्रतीत हो रहा है। कृष्ण ने सत्राजित से कहा, 'यह मणि तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम इसे महाराज उग्रसेन को दे दो।' सत्राजित ने मणि देने से ...