डॉ. प्रकाशचंद्र गंगराड़े, अप्रैल 28 -- अतिथि के लक्षण बतातेे हुए महर्षि शातातप (लघुशाता. 55) कहते हैं, 'जो बिना किसी प्रयोजन के, बिना बुलाए, किसी भी समय, किसी भी स्थान से घर में उपस्थित हो जाए, उसे अतिथि रूपी देवता समझना चाहिए। जिसके आगमन की पूर्व जानकारी हो, वह अतिथि नहीं कहलाता। हमारी संस्कृति में अतिथि देवो भनो, यानी अतिथि को देवताओं के समान कहा गया है। एक नहीं कई वेदों और पुराणों में अतिथि को लेकर महत्व बताया गया है।यद्वा अतिथि पतिरतिंथीन् प्रतिपश्यंति देवयजंनं प्रेक्षंते। -अथर्ववेद 9/6(1)/3 अर्थात द्वार पर आए हुए मेहमान (अतिथि) का स्वागत करना देवताओं को आहुतियां देने के समान है। इसका अर्थ है कि अगर हमारे घर कोई अतिथि आता है तो हमें उसका आदर सत्कार करना चाहिए, उसका आदर सत्कार करने से वैसा ही लाभ मिलता है जैसे आपने देवताओं की पूडा की ह...
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