हमीरपुर, नवम्बर 29 -- हमीरपुर, संवाददाता। हैवानियत का शिकार हुई किशोरी को बचाने में घर वालों ने तो जान झोंक दी, लेकिन सरकारी सिस्टम के आगे हार गए। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की दौड़-भाग और मदद के नाम पर कानूनी अड़चनें, पेंचीदगी ने किशोरी की जान ले ली। पहले ही दिन से सिर्फ मदद के आश्वासन मिलते रहे, मदद नहीं मिली। 31 दिनों तक किशोरी को बेटी की तरह पालने वाले चाचा-चाची और दो अन्य चाचा उसे लेकर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल की दौड़ लगाते रहे। किशोरी बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती है। उसके पिता की उसकी पैदाइश से पूर्व ही मौत हो गई थी। पूरा कुनबा ईंट-भट्ठे में मजदूरी करता है। किशोरी भी परिजनों संग ईंट-भट्ठे में काम करती थी। उसे पढ़ने का मौका ही नहीं मिला। पेट पालने की जद्दोजहद के चलते परिजनों के अक्सर बाहर होने की वजह से उसे भी साथ जाना पड़ता। पिता...
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