नई दिल्ली, अप्रैल 20 -- फिल्म डायरेक्टर्स के लिए क्रिएटिव होने से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है उस रचनात्मकता को जमीनी हकीकत पर उतारना। कई बार जब मेकर्स किसी बायोपिक या फिक्शन मूवी में कोई लार्जर दैन लाइफ सीन इमैजिन कर लेते हैं तो असली दिक्कत उसके बाद शुरू होती है। पर्दे पर उस सीन को दिखाने के लिए उनके पास दो ही ऑप्शन्स बचते हैं। पहला तो CGI और VFX जैसी तकनीकों का सहारा लेना और दूसरा वास्तविकता में उस सीन को रीक्रिएट करना। दूसरे वाले ऑप्शन में अच्छा खासा पैसा और मेहनत लगती है लेकिन पुराने वक्त में लोगों के पास ज्यादातर यही एक ऑप्शन हुआ करता था। यही वजह थी कि 1982 में आई एक फिल्म में ऐसा ही एक सीन शूट करने की कोशिश में मेकर्स ने 4 करोड़ रुपये खर्च कर दिए थे। आज के हिसाब से यह रकम 82.28 करोड़ रुपये होते।कौन सी थी मूवी, क्या था वो ऐतिहासिक...