झांसी, जून 18 -- झांसी..बूढ़े भारत में आई फिर नई जवानी थी। ..चमक उठी सन 57 में वह तलवार पुरानी थी, ..खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसीवाली रानी थी। गुरुवार को गांवों से शहर तक प्रथम दीपशिखा वीरांगना लक्ष्मीबाई वाली का बलिदान दिवस मनाया गया। सुभद्रा चौहान की यह पंक्तियां चहूंओर गूंजती रहीं। इसके अलावा महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान, नहीं भूलेगा हिन्दुस्तान की भी गूंज रही। वक्ताओं ने रानी की शान में कसीदे पढ़े गए। 'रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान, नहीं भूलेगा हिंदुस्तान' जैसे जयकारों के बीच जगह-जगह कार्यक्रम हुए। सियासी, गैर-सियासी दल, संस्थाओं, समाजसेवियों, व्यापारियों, छात्र-छात्राओं ने उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाए। वहीं शाम को प्राचीन धरोहरें दीपदान की रोशनी से जगमगा उठीं। यह भी पढ़ें- रानी लक्ष्मीबाई के अभिलेखों को जिज्ञासा से देखते रहे बच्चेलक्ष्मीबाई पार...