अलीगढ़, अगस्त 27 -- अलीगढ़। वरिष्ठ संवाददाता आज की डिजिटल युग में बच्चों का बचपन मोबाइल फोन की चारदीवारी में सिमटता जा रहा है। 'वर्ल्ड रॉक पेपर सीजर्स डे' जैसे मौकों पर जब हम अतीत के पन्नों को पलटते हैं, तो रॉक-पेपर-सीजर्स, गिल्ली-डंडा और लुका-छिपी जैसे उन पारंपरिक खेलों की याद ताजा हो जाती है, जो न केवल मनोरंजन का साधन थे, बल्कि बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

बच्चों की खेलने की आदतें समाज शास्त्री प्रो. एचएन सिंह बताते हैं कि एक समय था जब बच्चे खेल के मैदानों में घंटों पसीना बहाते थे और खेल-खेल में जीवन के बड़े पाठ पढ़ लेते थे। आज स्थिति पूरी तरह उलट चुकी है। अब बच्चों के हाथों में पारंपरिक खेलों की जगह स्मार्टफोन ने ले ली है। 'पबजी' जैसे हिंसक ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया पर 'रील' बनाने की सनक ने बच्चों...