कटिहार, मार्च 2 -- कटिहार, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि फागुन की हवा में कभी सिर्फ रंग नहीं, अपनापन भी घुला रहता था। होली से एक दिन पहले जब गांव के चौक-चौराहों पर होलिका दहन होता था, तो उसकी आग में गेहूं की बालियां सेंकी जाती थीं। अधजले दाने प्रसाद की तरह घर लाए जाते, जिन्हें शुभ मानकर परिवार के साथ बांटा जाता था। आज वही परंपरा धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही है। वरिष्ठ ग्रामीण रामलोचन यादव बताते हैं कि फागुन लगते ही होली की तैयारी शुरू हो जाती थी। रात होते ही युवाओं की टोली किसी मंदिर, चौपाल या सार्वजनिक स्थल पर जुटती। ढोलक, झाल और मंजीरा की संगत में फगुआ गूंजता। देवी-देवताओं पर आधारित होली गीतों से पूरा गांव सराबोर हो जाता। बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं-सबकी सहभागिता रहती। एक ही आंगन में पूरा परिवार बैठकर गीत गाता, सुनता और हंसी-ठिठोली में र...
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