नई दिल्ली, अगस्त 15 -- सुधीश पचौरी,हिंदी साहित्यकार एक दिन उसने धमकी दी, मैं तुम्हें ब्लॉक कर दूंगा। मैंने कहा, कर दो ब्लॉक, उससे क्या हो जाएगा? तुम हो कौन? अपने को क्या समझते हो? क्या तुम खुदा हो? बात तो तुमने ही शुरू की थी, तुमसे जवाब न बन पड़ा, तो खिसियाकर अपनी पर उतर आए। किस-किस को ब्लॉक करोगे? एक दिन तुम खुद ही ब्लॉक हो जाओगे। असहमति के ऐसे ही सीजन में एक कॉमरेड नाराज होकर कहने लगे, मैं तुम्हें 'अन्फ्रेंड' कर दूंगा। मैंने कहा, कर दो, तुम्हारी दोस्ती चाहिए ही किसे? मैं जरा असहमत हुआ, तो तुम इतने लाल-पीले हो गए? तुम तो अपने को 'जनवादी' कहते हो, जनंतात्रिक मूल्यों में यकीन करने वाला कहते हो और मेरी जरा सी असहमति नहीं सह पाए? असहमति को सहना ही तो जनतंत्र है। जो नहीं सह सकता, वह जनतांत्रिक कैसे? आजकल हिंदी साहित्य की यही संस्कृति है। जब त...