हमारी आस्था के सौदागर
नई दिल्ली, जुलाई 4 -- वे 1989 के ऐसे ही उमस भरे दिन थे। हम, यानी मैं और मेरे सहयोगी अयोध्या स्थित राम मंदिर के मुख्य अर्चक महंत लाल दास के सामने बैठे थे। महंत जी नाराज थे। उनका मानना था कि आंदोलन का तौर-तरीका ठीक नहीं है और इससे समाज में विभाजन का खतरा पैदा हो सकता है। वह बाबरी मस्जिद के ध्वंस या उसके कहीं और स्थानांतरण को भी उचित नहीं मानते थे। संयोग से उनके बाद हमें कारसेवकपुरम में आचार्य गिरिराज किशोर से मिलना था। हम जब वहां पहुंचे, तो बड़ी मात्रा में राम मंदिर के निर्माण के लिए 'देश भर से एकत्रित शिलाएं' देखकर हैरान रह गए। विश्व हिंदू परिषद और समूचा संघ परिवार पूरी शिद्दत से अपनी भावी योजना को आकार देने में जुटा था। आचार्य गिरिराज किशोर के समक्ष पहुंचते ही मैंने प्रश्न दागा कि आप लोग देश की 12 से 14 प्रतिशत आबादी (मुसलमानों) की भावनाओं...
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