नई दिल्ली, दिसम्बर 13 -- बरसों पहले किसी शख्सीयत के बारे में एक जुमला पढ़ा था- वह गिरे, उठे, फिर गिरे और अब जो उठे, तो हजारों उनके संग उठ गए। श्वेता अग्रवाल के सफरनामे को पढ़ते हुए अनायास वह जुमला याद हो आया। श्वेता का 'उन्मुक्त फाउंडेशन' भुवनेश्वर के हजारों गरीब बच्चों के लिए एक ऐसा प्रकाश-स्तंभ साबित हुआ है, जिसकी रोशनी से उनका पूरा जीवन आलोकित हो उठा है। श्वेता जैसी बेटियों पर पूरे समाज और देश को नाज होना चाहिए। उत्तर प्रदेश के हापुड़ का एक अग्रवाल परिवार दशकों पहले मध्य प्रदेश के ग्वालियर में आ बसा था। उसी निम्न मध्यवर्गीय परिवार में आज से 41 साल पहले श्वेता पैदा हुईं। पिता स्थानीय जेसी मिल्स में काम करते थे और मां गृहिणी थीं। हर माता-पिता की तरह उन्होंने भी शहर के एक अच्छे स्कूल में अपने दोनों बच्चों (श्वेता व उनके बड़े भाई) का नाम ल...