मेरठ, मार्च 15 -- महोत्सव में यज्ञ के बाद मंच पर अर्शिका का दीदी ने प्रवचन करते हुए कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर छोटी छोटी बातों, आपसी झगड़ों, ईर्ष्या और दूसरों की कही बातों में उलझकर अपने मन को दुखी कर लेते हैं। मानना है कि जब व्यक्ति दूसरों की राय और शब्दों को जरूरत से ज्यादा महत्व देने लगता है, तो वह धीरे धीरे अपनी ही कीमत और जीवन की महत्ता को भूलने लगता है। समाजशास्त्रियों के अनुसार, नकारात्मक वातावरण और निराशाजनक विचारों के बीच अधिक समय बिताने से व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है। ऐसी स्थिति में कई लोग खुद को दूसरों पर निर्भर महसूस करने लगते हैं, जिससे उनका मानसिक संतुलन और निर्णय क्षमता भी प्रभावित होती है। बताते हैं कि इस स्थिति से बाहर निकलने का सबसे प्रभावी तरीका स्वाध्याय है। स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं क...