स्कूल से जी चुराने वाले बने गुरुदेव
नई दिल्ली, मई 2 -- सुबह सब बच्चे स्कूल जाने को तैयार हो जाते थे। स्कूल छोड़ने के लिए घोड़ागाड़ी दरवाजे पर आ लगती थी, पर वह 12 वर्षीय बच्चा अक्सर भागकर अपने विशाल भवन की छत पर छिप जाता था। नीचे उसे खोज रहे नौकर और भाई-बहन समझ जाते थे कि बच्चे ने आज भी छिपकर एक छुट्टी चुरा ली है। छत पर वह बच्चा अपने अबोध कवि हृदय को सुंदर नीले आकाश में डुबोए घंटों बैठा रहता था। उसे लगता था, वह इतने मनोरम गगन, बाग, पुष्प, पंछियों को छोड़कर स्कूल क्यों जाए? शांत सरोवर में थिरकते बरगद की परछाई से क्यों वंचित रहे? क्या प्रकृति से भी अच्छा कोई स्कूल है? बच्चों के मन को स्कूल की इमारतों में कैद रखना यातना ही तो है। क्या स्कूल एक ऐसा डिब्बा नहीं है, जहां बच्चों को बंद कर दिया जाता है? उस बच्चे के मन में ऐसे ही सवाल उमड़ते थे। उसके जितने भी बड़े भाई थे, सब एक से बढ...
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