शामली, फरवरी 23 -- शहर के जैन धर्मशाला में आयोजित प्रवचन में मुनि श्री 108 प्रतीक सागर मुनिराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में मंगल और अमंगल का निर्धारण बाहरी परिस्थितियों से अधिक उसकी दृष्टि, वाणी और विचारों से होता है। उन्होंने कहा कि जैसा चित्र वैसा चित की उक्ति जीवन में पूर्णतः सार्थक है। रात को सोते समय हमारी आंखों के सामने जो चित्र होता है और प्रातःकाल उठते ही जिस वस्तु या व्यक्ति पर पहली नजर जाती है, वही हमारे दिन और जीवन की दिशा तय करती है। यदि सुबह सबसे पहले किसी शांत, पवित्र और मंगलमय स्वरूप का दर्शन किया जाए तो भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मुनि श्री ने कहा कि दिन की शुरुआत सामान्य सांसारिक शब्दों से नहीं, बल्कि पवित्र व मंगलमय वचनों से होनी चाहिए। चाय बन गई? जैसे शब्दों के स्थान पर नवकार नमस्कार जैसे पवित्र शब्दों का उच्...