सुपौल, जून 29 -- ​त्रिवेणीगंज , निज प्रतिनिधि। अधिक आर्थिक लाभ की चाहत और ​चकाचौंध और आडंबर से युक्त जीवन शैली ने हमारी पारंपरिक खेती और सेहत के खजाने पर गहरा आघात किया है। किसी समय कोसी और सीमांचल के खेतों व घर -आंगनों की रौनक रहने वाले देसी केले की विभिन्न प्रजातियां अब तेजी से विलुप्त हो रही हैं। अब ग्रामीण इलाकों में भी विरले ही देसी प्रजाति के केले के पेड़ दिखाई देते हैं। बाजार में दिखने वाले बड़े पीले पीले चमकदार हाइब्रिड केलों की चमक ने हमारे पारंपरिक केलों को हाशिए पर धकेल दिया है। ​मालूम हो कि त्रिवेणीगंज सहित कोसी और सीमांचल क्षेत्र में पहले मालभोग, बतीसा, चिनियां, मानकी, भोस, बागनर और सिंगापुरी जैसी अद्वितीय प्रजातियों के केलों की भरमार हुआ करती थी। पूजा-पाठ से लेकर मेहमाननवाजी तक में मालभोग और चिनियां केले की मांग सबसे अधिक रह...