सुपौल, जुलाई 12 -- वीरपुर, एक संवाददाता। पग-पग पोखर, माछ-मखान से पहचान रखने वाले मिथिलांचल में अब देसी मछलियों का स्वाद लोगों की थाली से धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। कभी नहरों, पोखरों, आहर-पइन और तालाबों में सहज रूप से मिलने वाली रोहू, कतला, टेंगरा, गरई, मांगुर, सिंघी, पोठी, झींगा और लट्ठा जैसी स्थानीय प्रजातियां अब दुर्लभ होती जा रही हैं। इसके पीछे सिकुड़ते जलस्रोत, गाद जमाव, अतिक्रमण और प्रदूषण एवं जहरीली दवाओं का प्रयोग को प्रमुख कारण माना जा रहा है। यह भी पढ़ें- सुपौल : मिथिला की थाली से गायब हो रहीं देसी मछलियां, बाहरी का कब्जामछली का सांस्कृतिक महत्व मिथिला की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा में मछली का विशेष महत्व रहा है। मिथिला के ध्वज-पताका में सूर्य और मछली का प्रतीक अंकित है। यहां शुभ अवसरों पर मछली का विशेष स्थान है और 'माछ-भात...