नई दिल्ली, जनवरी 16 -- हम सब लोगों ने कभी न कभी अपने जीवन में उस स्थिति का अनुभव जरूर किया होगा, जहां सामने 'मुफ्त' का भोजन देख हमारी भूख और विवेक दोनों मौन हो गए हों। दावतों या बफे (Buffet) की कतार में खड़े होकर जरूरत से ज्यादा अपने खाने की प्लेट को भर लेना महज एक आदत नहीं, बल्कि हमारे मस्तिष्क की एक गहरी मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। यह मानव के स्वभाव का वह हिस्सा है, जो भोजन की प्रचुरता को देख 'भविष्य की कमी' के डर से उसे तुरंत संचित कर लेना चाहता है। जब स्वाद का लालच और मुफ्त मिलने का मनोवैज्ञानिक संकेत एक साथ मिलते हैं, तो हमारा 'सेंस ऑफ कंट्रोल' धुंधला पड़ जाता है। वास्तव में, यह व्यवहार हमारी भूख से नहीं, बल्कि उस 'रिवॉर्ड सिस्टम' से संचालित होता है जो मुफ्ट की उपलब्धता को एक सुनहरे अवसर के रूप में देखता है, भले ही इसकी कीमत हमें अप...