गिरडीह, अप्रैल 21 -- पीरटांड़, प्रतिनिधि। साधु की साधना और श्रावक की आराधना से धर्म मार्ग प्रशस्त होता है। धर्म की सशक्त परंपरा साधु की साधना और श्रावक की आराधना के समन्वय से ही बढ़ता है। साधु अपनी तपस्या, संयम और आत्मशुद्धि से धर्म का आदर्श प्रस्तुत करता है जबकि श्रावक श्रद्धा, सेवा, दान और सहयोग के माध्यम से उस आदर्श को समाज में स्थापित करता है। जब दोनों प्रवाह एक साथ चलता है, तब धर्म का मार्ग सुदृढ़, प्रभावी और स्थायी बनता जाता है। उक्त बातें मधुबन में साधनारत मुनि प्रमाण सागर जी महाराज प्रवचन सभा में कही। ज्ञात रहे कि सम्मेदशिखर जी मधुबन साधु संतों के सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम से गुलजार हो रहा है। यह भी पढ़ें- अक्षय तृतीया से ही प्रारंभ हुई थी आहारदान की परंपरा साधु संतों के सानिध्य में विविध धार्मिक कार्यक्रम पूजा आराधना से...