नई दिल्ली, जुलाई 18 -- कभी उनकी जिंदगी में इतने अभाव थे कि उन्हें बहुत आसानी से अभागा कह दिया जाता था। उन्होंने होश भी नहीं संभाला था कि पिता का साया उठ गया। आंखें अभी खुली ही थीं कि मां ने उन्हें चाचा-चाची को सौंप दिया। होश संभाला ही था कि प्यारे चाचा चल बसे। जिंदगी अभावों के भंवर में ऐसी फंसी कि सबसे पहले पढ़ाई छूट गई। उम्र जैसे ही 12वें वर्ष में पहुंची, लकड़ी की चकरी बनाने वाली मिल में मजदूरी के लिए मजबूर होना पड़ा। वह मजदूरों की भीड़ में खो जाते, पर एक गुण था, जो उन्हें तमाम मजदूरों से अलग ला खड़ा करता था। वह सवाल पूछते थे और कुछ नया जानने की बेहिसाब तमन्ना थी। सवाल उन्हें हमेशा आगे ला खड़ा करते थे। ऐसा क्यों होता है? कैसे या कब होता है? ऐसा फिर कैसे होगा? इसे मैं कैसे करूंगा? वह सवाल लिए जवाबों का पीछा करते रहते थे। उन्हें एक दिन पता...