देहरादून, मई 9 -- स्वामी मैथिलीशरण ने कहा कि हमारा सनातन धर्म केवल चन्द्रमा की नहीं अपितु सूर्य नक्षत्र तारामंडल,आकाश पृथ्वी,जल, वायु, पशु,मनुष्य पत्थर और लकड़ी सबकी पूजा करता है। सूर्य यदि धान्य को पकाता है तो चन्द्रमा फलों और धान्य में रस और मिठास देता है, मध्य स्थिति और व्यापक दृष्टि ही हमारी व्यापकता और सार्वकालिकता का शाश्वत आधार है। शनिवार को आयोजित कथा में मैथिलीशरण ने कहा कि जैसे छोटे पत्ते में पूर्णता की संभावना होती है ,उसी तरह भगवान शंकर ने भी अपने मस्तक पर द्वितीया के चन्द्रमा को इसलिए स्थान दिया है कि जो पूर्णता की सम्भावनाओं से परिपूर्ण है वहीं शिव रूप विश्वास का आश्रय लेकर भगवान की भक्ति रूपा सीता को प्राप्त कर सकता है। पूर्ण प्रभु रामचंद्र और सीता जी के पुन:मिलन की दिव्य संभावना का शुभारम्भ है। हनुमान जी ने लंका में विभीषण...