नई दिल्ली, नवम्बर 25 -- मनुष्य अपने विचारों और कृतियों से स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करता है। इसमें कोई शंका नहीं है कि वह अपने भाग्य का स्वामी है। उदात्त विचारों से मन उन्नत और हृदय विशाल होता है। असद् विचार से मन उत्तेजित होता है तथा भावनाएं दूषित और स्थूल होती हैं। रीर मन का ही प्रतिरूप है। अगोचर सूक्ष्म मन का यह गोचर स्थूल रूप है। दांत में, पेट में या कान में कहीं जरा-सा कष्ट हुआ कि फौरन मन उससे प्रभावित होता है। वह ठीक से सोच नहीं पाता। चिंतित, क्षुब्ध और अशांत हो जाता है। जब मन उद्विग्न हो जाता है, तब शरीर भी ठीक से काम नहीं कर पाता। शरीर को क्लेशित करने वाली पीड़ाएं 'व्याधि' कहलाती हैं तथा मन को क्लेशित करने वाली वासनाओं को 'आधि' नाम से अभिहित किया जाता है।सद्-असद् विचारों का प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य की अपेक्षा मानसिक स्वास्थ्य अध...