पूर्णिया, मार्च 20 -- जानकीनगर, एक संवाददाता। जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में इस धरती पर क्रीड़ा की, उसी प्रकार हमारे आराध्य देव भी इस पावन भूमि पर अवतरित हुए। उन्होंने संतमत के मूल सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए कहा कि संत वह है जो सत्य को जान लेता है, परमात्मा को पहचान लेता है और मृत्यु पर विजय प्राप्त कर आत्मबोध कर लेता है। उन्होंने कहा, खीर पूरी, रोटी सब्जी शरीर का भोजन है। सत्संग मन का भोजन है और ध्यान साधना आत्मा का भोजन है। जो व्यक्ति अपने सुख के लिए किसी को दुःख नहीं देता, वही सच्चा मानव है। और जो दूसरों को सुख देने के लिए स्वयं कष्ट सहता है, वह देवतुल्य है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे नाले का जल गंगा में मिलकर गंगा बन जाता है, वैसे ही संतों के ज्ञान से जुड़कर व्यक्ति का जीवन पवित्र हो जाता है। ईश्वर भक्ति, नि...