वाराणसी, अप्रैल 6 -- वाराणसी, संवाददाता। रानी तारामती के क्रंदन ने जैसे क्षणभर को समय को थाम लिया। राजा हरिश्चंद्र की दानशीलता ने महारानी का सब्र को चुनौती दे दी थी। मौका था कबीरचौरा स्थित नागरी नाटक मंडली में चल रहे आल इंडिया कल्चरल काउंसिल (एआईसीसी) के अधिवेशन के दूसरे दिन रविवार को नाटक 'राजा हरिश्चंद्र' के मंचन का।कथानक के अनुसार इंद्र को अपने सिंहासन के डगमगाने का भय सताता है। वे विश्वामित्र से कहते हैं कि हरिश्चंद्र के दान और धर्म की परीक्षा ली जाए। उसी रात हरिश्चंद्र के स्वप्न में विश्वामित्र आते हैं। स्वप्न में ही राजा अपना सर्वस्व उन्हें दान कर देते हैं। दृश्य बदलते ही मंच पर राजा का वैभव समाप्त हो चुका होता था। डोमराज के हाथों बिके हरिश्चंद्र के राजसी वस्त्र चीथड़ों में बदल गए। दर्शकों की भीड़ खामोश, मानो हर व्यक्ति सांस रोके उस...