नई दिल्ली, जनवरी 6 -- ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के पश्चात सत्यकाम विवाह करके जीवन व्यतीत करने लगा। वह आश्रम स्थापित करके विद्यार्थियों को विद्या प्रदान किया करता था। उसके आश्रम में दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन करने के लिए आते थे। सत्यकाम की विद्वत्ता की कहानी कमल के पुत्र उपकोशल के कानों में भी पड़ी। वह भी विद्या प्राप्त करने के उद्देश्य से सत्यकाम के आश्रम में जा पहुंचा। सत्यकाम की अनुमति से उपकोशल ब्रह्मचारी के रूप में विद्याध्ययन करने लगा। कई वर्षों के पश्चात जब अध्ययन समाप्त हो गया, तो सत्यकाम ने दूसरे विद्यार्थियों का तो समावर्तन संस्कार करके उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी, पर उन्होंने उपकोशल का न तो समावर्तन किया, न उसे घर जाने की आज्ञा दी। उपकोशल मन-ही-मन दुखी हुआ। वह सोचने लगा, आचार्य ने उसके साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया? गुरु-पत्नी उप...