मदुरै, अप्रैल 24 -- मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक और दार्शनिक फैसला सुनाते हुए, अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले एक व्यक्ति की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया है। जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने माना कि मृत्युदंड की तुलना में दोषी को उसके अपराध बोध के साथ जिंदा रखना और तिल-तिल कर मरने देना अधिक प्रभावी सजा है।अदालत का मुख्य तर्क: फांसी से बड़ा दंड है आत्मग्लानि के साथ जीना बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने मौत की सजा पर एक विस्तृत दार्शनिक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि फांसी की सजा अंतिम, तात्कालिक और अपरिवर्तनीय है। यह न केवल जीवन को समाप्त कर देती है, बल्कि पश्चाताप या नैतिक सुधार की संभावना को भी खत्म कर देती है। अदालत ने माना कि दोषी को जिंदा...