पूर्णिया, सितम्बर 27 -- पूर्णिया, हिन्दुस्तान संवाददाता। आश्विन मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को पुत्र-पौत्रों के आयु, आरोग्य तथा कल्याण की कामना से जीवत्पुत्रिका व्रत का विधान किया जाता है। इसे जीतिया व्रत अथवा जीमूतवाहन व्रत के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत मुख्यतः माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। इस संबंध में पंडित आचार्य वंशीधर झा ने बताया कि धर्मशास्त्रीय विधान में प्रदोषव्यापिनी अष्टमी को विशेष महत्त्व दिया गया है। प्रदोषकाल में जीमूतवाहन के पूजन का निर्देश मिलता है-"प्रदोषसमये स्त्रीभिः पूज्यो जीमूतवाहनः।"अर्थात् प्रदोषकाल में स्त्रियों द्वारा जीमूतवाहन का पूजन किया जाना चाहिए। यदि दो दिनों में अष्टमी प्रदोषव्यापिनी हो, तो तिथि-निर्णय शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाता...