वाराणसी, अप्रैल 12 -- वाराणसी। कला और साहित्य दोनों का गहरा अंतर्संबंध है। दोनों एकदूसरे की पूर्णता में कार्य करते हैं। ये बातें अंतरराष्ट्रीय ख्याति के चित्र एवं मूर्तिशिल्पी प्रो.मदनलाल गुप्त ने कहीं। संकटमोचन संगीत समारोह की छठवीं संध्या में साहित्य कला मंच पर चर्चा सत्र में वह अध्यक्षीय संबोधन कर रहे थे। 'साहित्य और कला : एक अंतःसंबंध' विषय पर चर्चा में प्रो. गुप्त ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन के दिन साझा किए। कला और साहित्य एक साथ कैसे पनपते हैं, इसका उदाहरण पेश किया। बताया कि कक्षा आठ में पढ़ाई के दौरान मूंगफली बेचते समय ग्राहक नहीं होते थे तब वह उपन्यास लिखने की कोशिश करते थे। स्कूल में पढ़ाई के दौरान मानस के दोहे पौपाइयां गाने पर प्रशंसा के बाद उनकी हसरत संगीत सीखने की हुई। उन्होंने मां से दस रुपये का बैंजो खरीदने का अनुरोध किया। परिव...