शुद्ध हृदय से ही भक्ति संभव
वाराणसी, अगस्त 8 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। भगवान की ओर बढ़ने से पहले मनुष्य को अपना अन्तःकरण उनके योग्य बनाना होगा। किसी बर्तन में पहले से जल भरा हो तो उसमें दूसरी वस्तु रखने के लिए पहले उसे खाली करना पड़ता है। ये बातें भागवताचार्य आनंद बिहारी शास्त्री ने कहीं। वह तारानगर स्थित वेद मंदिर में वैदिक एजुकेशनल रिसर्च सोसाइटी में श्रीमद्भागवत कथा के आठवें दिन शनिवार को प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विषयवासना और विकारों से भरे हुए हृदय में भक्ति का अमृत नहीं समा सकता। इसके लिए हमें अपने अंत:करण को वासनाओं से खाली करना होगा। अपने जीवन में ईश्वर को धारण करना ही श्रीमद्भागवत का वास्तविक संदेश है।
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