बांका, जून 22 -- पंजवारा(बांका),निज प्रतिनिधि। बदलते दौर में जहां आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था ने लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है,वहीं सदियों पुरानी जल संस्कृति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। कभी गांवों की पहचान और शुद्ध पेयजल का सबसे भरोसेमंद श्रोतरहे कुएं आज उपेक्षा के शिकार हैं।

परंपरागत जल स्रोतों की उपयोगिता नल-जल योजना,समर्सिबल पंप और पाइपलाइन आधारित जल व्यवस्था के बढ़ते उपयोग ने पारंपरिक जल स्रोतों की उपयोगिता को कम कर दिया है।परिणामस्वरूप अनेक कुएं या तो कचरे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं या फिर उन्हें पूरी तरह भर दिया गया है।एक समय ऐसा था जब गांवों का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन कुओं के इर्द-गिर्द घूमता था। सुबह होते ही महिलाओं की आवाजाही,पानी भरने की हलचल और सामाजिक मेलजोल का केंद्र यही कुएं होते थे।

जल संरक्षण और सांस्कृतिक पह...