वाराणसी, अगस्त 11 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। पूर्वकाल में भगवान शिव ने सौ करोड़ श्लोकों का एक पुराणग्रंथ बनाया था। द्वापर आदि युगों में द्वैपायन आदि महर्षियों ने इसे 18 भागों में विभक्त कर दिया। उन्हीं 18 में एक निर्मल शिवपुराण स्वयं भगवान् शिव द्वारा प्रतिपादित है। ये बातें स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती ने कहीं। वह अस्सी स्थित पूर्वाम्मनाय श्रीदक्षिणामूर्ति मठ में चातुर्मास के अंतर्गत शिवमहापुराण की तात्विक विवेचना कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मूल शिवपुराण की श्लोक संख्या एक लाख है परंतु बाद में भगवान् वेदव्यास ने उसे 24 हजार श्लोकों में संक्षेप कर संकलित किया। शिवपुराण समस्त जीव समुदाय के त्रिविध तापों का नाशक है। यह भी पढ़ें- पापी भी शिव महापुराण की कथा सुनने से हो जाता है पवित्र प्रातः मंगला आरती के पश्चात भगवान श्री दक्षिणामूर्ति का पूज...