वाराणसी, सितम्बर 30 -- रामनगर, संवाद। राजा जनक व्याकुल हैं। दरबार में कई महारथी हैं लेकिन कोई भगवान शिव का धनुष नहीं तोड़ पा रहा है। चिंतित हैं कि सीता स्वयंवर सफल कैसे होगा। स्वयं को कोस रहे हैं कि इतनी दुरूह प्रतिज्ञा की ही क्यों? स्थिति यह है कि धनुष तोड़ने की बात दूर, कोई उसे हिला नहीं पा रहा है। मन व्यथित है कि संसार में कोई नहीं जो उनकी बेटी की वरमाला पहन सके। यह भी पढ़ें- राम-जानकी विवाह से हुआ दो विचारधाराओं का समन्वय- विजय कौशलधनुष तोड़ने की कोशिश किशोरवय प्रभु श्रीराम गुरु विश्वामित्र और अनुज लक्ष्मण के साथ स्वयंवर स्थल पर उपस्थित हैं। निराश मन जनक कहते हैं-'मुझे पता है कि धरती वीरों से खाली है।' उनका कथन सुन लक्ष्मण की भृकुटि तन जाती है। क्रोधित होकर कहते हैं-'गुरु की आज्ञा हो तो धनुष क्या मैं पृथ्वी को घड़े की तरह फोड़ दूं।' ग...