शांति के साथ दुख सहन करना सबसे बड़ा तप है: मुनिश्री
कोडरमा, सितम्बर 22 -- झुमरीतिलैया, निज प्रतिनिधि। जैन धर्म के श्रेष्ठ पर्व दसलक्षण पर्यूषण के सातवें दिन श्रद्धालुओं ने उत्तम तप धर्म के रूप में पर्व मनाया। इस अवसर पर जैन मुनि श्री 108 सुयश सागर जी महाराज ने अपनी अमृतवाणी से साधर्मी बंधुओं को तप धर्म का महत्व बताया। कहा कि इच्छाओं का त्याग करना ही तप धर्म है। शांति के साथ दुख सहन करना सबसे बड़ा तप है। बिना तप के आत्मा का शुद्धिकरण संभव नहीं है। इसलिए जीवन में उसी के सामने झुकना चाहिए, जिसके जीवन में तप हो। मुनिश्री ने कहा कि जमीन के अंदर और पैरों के नीचे दबने वाली मिट्टी भी आग में तपने के बाद मूर्ति का आकार लेकर पूजनीय हो जाती है। इसी प्रकार तप व्यक्ति के जीवन को निखारता है। तप विशुद्धि और वाणी संयम के साथ किया जाना चाहिए। मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए अंत:करण को स्वच्छ रखते हुए संयम के...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.