जमशेदपुर, मार्च 20 -- झारखंड की पावन धरा पर प्रकृति पर्व सरहुल की छटा बिखरने लगी है। आदिवासियों और मूलवासियों का यह सबसे बड़ा त्योहार जल, जंगल और जमीन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है। सरहुल मुख्य रूप से साल (सखुआ) के वृक्ष की पूजा का उत्सव है, जो चैत्र मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार, साल के वृक्ष में उनके इष्ट देव का वास होता है और जब सखुआ के पेड़ों पर नए फूल खिलते हैं, तब इस पर्व की शुरुआत होती है। झारखंड के विभिन्न समुदायों जैसे उरांव, हो, मुंडा और संताल समाज के लिए यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का माध्यम है।जमशेदपुर में सरहुल का स्वरूप बेहद भव्य और सामुदायिक होता है। यहां'केन्द्रीय सरहुल पूजा समिति' के नेतृत्व में पूरा शहर एक सांस्कृतिक सूत्र में बंध जात...