भागलपुर, मई 23 -- कहलगांव, निज प्रतिनिधि। लीला और क्रिया में मूलभूत अंतर होता है। अभिमान अथवा स्वयं सुखी रहने की इच्छा से किया गया कार्य क्रिया कहलाता है, जबकि बिना किसी अहंकार के दूसरों को सुख देने और उनके कल्याण की भावना से किया गया कार्य लीला कहलाता है। ये बातें लगमा हाट कहलगांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथा वाचक स्वामी माधवानंद महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए कही।उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में सदैव लोककल्याण की भावना से लीलाएं की। जिससे समस्त गोकुलवासी सुखी और समृद्ध रहें। माखन चोरी प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका वास्तविक अर्थ भक्तों के मन को जीत लेना है। यह भी पढ़ें- लोक व्यवहार की शिक्षा देती हैं भगवान की लीलाएं : आचार्य भारतभूषण कथा श्रवण के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ ल...