नई दिल्ली, जनवरी 6 -- अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो, जूझने का माद्दा हो और चुनौती स्वीकार करने के लिए हद से ज्यादा जुनून तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। मौत तक को मात दी जा सकती है। निराशा के अंधेरे में भी रोशनी जगमगा सकती है। सब कुछ छूटने का भय सामने खड़ा हो लेकिन उम्मीद का अटूट दामन हो तो जिंदगी मुस्कुरा सकती है। युवराज सिंह पर ये सभी लाइनें सटीक बैठती हैं। उनकी जिंदगी अपने आप में फिल्मी है। उनका जज्बा खुद को ढांढस या हौसला देना नहीं है, बल्कि काल के कपाल पर लिखने का असल माद्दा है।असल जीवन में खींच दी ऋषिकेश मुखर्जी के 'आनंद' से बड़ी लकीर कल्पना कीजिए कि किसी को अचानक पता चलता है कि उसे कैंसर है। डॉक्टर उसे कह दे कि आपके पास जीने के लिए सिर्फ 3 से 6 महीने है। तब किसी की प्रतिक्रिया क्या होगी? सबसे आदर्श रूप तो महान फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी ...