उन्नाव, दिसम्बर 17 -- उन्नाव। सुबह घर से निकलते वक्त कोई यह सोचकर नहीं निकलता कि वह लौटेगा या नहीं। लेकिन, जिले की सड़कों पर कदम रखते ही यह सवाल हर राहगीर के साथ चलने लगता है। शासन-प्रशासन के दावों और फाइलों में सड़क सुरक्षा मजबूत है, मगर हकीकत में सड़कें आज भी मौत के गलियारे बनी हुई हैं। ओवरस्पीड और ओवरलोड वाहनों की बेलगाम रफ्तार हर दिन किसी न किसी परिवार की खुशियां छीन रही है। कहीं स्कूल वैन बच्चों से ठसाठस भरी दौड़ रही है तो कहीं ई-रिक्शा क्षमता से दोगुना बोझ लेकर फर्राटा भर रहे हैं। डंपर, ट्रक और बसें ऐसे दौड़ती हैं जैसे सड़क उनकी निजी जागीर हो। हर हॉर्न के साथ खतरा और हर मोड़ पर हादसे की आशंका साफ महसूस होती है। आपके अपने अखबार 'हिन्दुस्तान' की पड़ताल में सामने आया कि कानपुर-लखनऊ नेशनल हाईवे हो या शहर के लिंक मार्ग, कहीं भी नियमों का...
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