मैं मर्द हूं, मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।
नई दिल्ली, सितम्बर 30 -- मैं मर्द हूं। मुझे किसी भी देश, किसी भी राज्य, किसी भी जिले का मर्द समझ लो। मैं हर जगह एक जैसा ही हूं। मेरी पहचान ही यही है कि मैं मर्द हूं। तुम्हें पता है, मैं मंदिरों, मस्जिदों और गिरिजाघरों में कई मिन्नतों के बाद पैदा होता हूं। मेरे जन्म पर आज तक कभी मातम भी नहीं मनाया गया। जन्म होते ही शुरू हो जाती है मेरी मर्दानगी की क्लास। मां की गोद में आते ही मैं बन जाता हूं 'राजा बेटा'। आज मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं। बचपन में मैं लड़कियों वाले खिलौने से नहीं खेलता। मैं क्यों खेलूं? मैं बंदूक से खेलता हूं। और गाड़ियों से। अपनी गाड़ी से रास्ते में आने वाली सारी चीजों को गिरा देता हूं। चाभी, गुलदस्ता, गुड़िया.। मेरे मां बाप बेहद खुश होते हैं मेरा ये खेल देखकर। फिर जब स्कूल जाता हूं लड़कियों से दोस्ती नहीं करता। अरे मै...
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