मुंबई, जून 28 -- बॉम्बे हाई कोर्ट ने कम हाजिरी की वजह से परीक्षा में बैठने से रोके जाने के विश्वविद्यालय के फैसले को चुनौती देने वाली एक लॉ की छात्रा को ''लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना'' बयान देने के लिए कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि न्याय का मतलब यह नहीं है कि मैं जो चाहूं और जैसे चाहूं, वैसा हो। जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस अजित कदेथंकर की औरंगाबाद बेंच ने 23-वर्षीय एक युवती की याचिका खारिज कर दी। बेंच ने कहा कि झूठे दावों के जरिए अपनी गलतियों को छिपाने की उसकी कोशिश कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है, जिससे कानूनी पेशे में उसका करियर खतरे में पड़ सकता है। अदालत ने 18 जून के अपने फैसले में कहा कि अदालतों में उठाए जाने वाले किसी भी मामले का मकसद नेक नीयत वाला होना चाहिए। बेंच ने कहा, ''कोर्ट में हर कार्यवाही न्याय पाने के लिए होती है...