वाराणसी, अगस्त 9 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। नायक-नायिका के मिलन और विरह पक्ष पर केंद्रित पारंपरिक लोकगायन कजरी के प्रतीक-बिंब अब बदलने लगे हैं। पूजा, प्रकृति और प्रेम की राहों से गुजरने वाली विधा के तेवर अब 'तल्ख' हो गए हैं। यह सम-सामयिक घटनाओं को पिरोने लगी है। यह भी पढ़ें- Jaunpur News: कजरी हमारी समृद्ध लोक संस्कृति की पहचान है: कृपाशंकर सिंहकजरी के राजनीतिक पहलू हालांकि स्वतंत्रता संग्राम में भी इसके तेवर नरम नहीं थे। सेनानियों की गुप्त बैठकों के आमंत्रण की संदेशवाहिका बनी तो आजादी की लड़ाई से दूर पुरुषों पर तंज भी कसे। नेपाल-बांग्लादेश की राजनीतिक गतिविधियां तो जंतर-मंतर (नई दिल्ली) पर जेन-जी का आंदोलन आज की कजरी का मुख्य विषय है। रचनाकार सुषमा मिश्र लिखती हैं-'मंडरात बाटे खतरा, अपना देश में...सचेत रहीह होत घुसपैठ से।' इसमें जंतर-म...